‘सीटें नहीं बढ़नी चाहिए’, परिसीमन पर तमिलनाडु ने केंद्र के सामने रखा बड़ा प्रस्ताव…

CM Vijay meet PM Modi: राज्य सरकार का कहना है कि अगर केंद्र सरकार 1971 के बाद हुई किसी जनगणना के आधार पर परिसीमन करती है, तो तमिलनाडु समेत दक्षिण भारत के राज्यों को इसका बड़ा नुकसान हो सकता है।

New Delhi: लोकसभा सीटों के संभावित परिसीमन को लेकर तमिलनाडु और केंद्र सरकार के बीच राजनीतिक बहस तेज होती जा रही है। तमिलनाडु विधानसभा ने परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्ताव के जरिए केंद्र से मौजूदा 543 लोकसभा सीटों की संख्या को स्थिर रखने की मांग की है। राज्य सरकार का तर्क है कि आबादी के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण करने से उन राज्यों को नुकसान हो सकता है, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के मोर्चे पर बेहतर प्रदर्शन किया है।

तमिलनाडु को सीटें घटने का डर क्यों?
परिसीमन का मूल आधार आबादी का प्रतिनिधित्व होता है। ऐसे में यदि भविष्य में लोकसभा सीटों का पुनर्गठन अपेक्षाकृत अधिक आबादी वाली राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए किया जाता है, तो दक्षिण भारत के राज्यों की राजनीतिक ताकत का अनुपात घट सकता है।

तमिलनाडु सरकार का कहना है कि दक्षिण भारतीय राज्यों ने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण की नीतियों को लंबे समय तक प्रभावी ढंग से लागू किया। ऐसे में केवल आबादी के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण करने से उन्हें राजनीतिक रूप से ‘दंडित’ किए जाने जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।

543 सीटों को स्थिर रखने की मांग
तमिलनाडु विधानसभा में पेश प्रस्ताव में लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को फ्रीज रखने की मांग की गई है। प्रस्ताव में लोकसभा और राज्यसभा के बीच मौजूदा प्रतिनिधित्व के अनुपात को भी बनाए रखने की बात कही गई है।

प्रस्ताव के मुताबिक, लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने के बजाय मौजूदा सीटों को ही आधार बनाया जाए, ताकि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के प्रतिनिधित्व पर प्रतिकूल असर न पड़े।

महिला आरक्षण को लेकर भी प्रस्ताव
तमिलनाडु विधानसभा के प्रस्ताव में मौजूदा 543 लोकसभा सीटों पर 33 प्रतिशत महिला आरक्षण तत्काल लागू करने की मांग भी की गई है।

राज्य का तर्क है कि महिला आरक्षण को परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़कर लंबे समय तक टालने के बजाय मौजूदा लोकसभा सीटों के आधार पर ही इसे लागू किया जाना चाहिए।

2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन की मांग
प्रस्ताव में कहा गया है कि लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों का पिछला व्यापक परिसीमन लंबे समय से नहीं हुआ है। तमिलनाडु का कहना है कि यदि परिसीमन किया जाना है तो 2011 की जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाया जाना चाहिए।

राज्य सरकार का मानना है कि नई जनगणना के आधार पर सीटों का बड़ा पुनर्वितरण दक्षिण भारतीय राज्यों के प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकता है।

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‘एक राज्य, एक वोट’ नहीं बल्कि प्रतिनिधित्व का सवाल
परिसीमन को लेकर तमिलनाडु का विरोध केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं है। इसके पीछे बड़ा सवाल यह है कि संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व आबादी के आधार पर कितना और किस तरीके से तय किया जाए।

दक्षिण भारत के कई राज्यों का तर्क रहा है कि यदि आबादी को ही एकमात्र आधार बनाया गया तो अधिक जनसंख्या वाले राज्यों का लोकसभा में प्रभाव लगातार बढ़ेगा, जबकि जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम हो सकती है।

विजय सरकार की रणनीति
तमिलनाडु में मुख्यमंत्री विजय के नेतृत्व वाली सरकार इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण मान रही है। विधानसभा में प्रस्ताव के जरिए केंद्र पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है कि परिसीमन की प्रक्रिया में राज्यों के प्रतिनिधित्व और जनसंख्या नियंत्रण के प्रदर्शन को भी ध्यान में रखा जाए।

इस मुद्दे पर केंद्र और दक्षिण भारतीय राज्यों के बीच आने वाले समय में राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है। परिसीमन केवल तमिलनाडु की सीटों का सवाल नहीं है, बल्कि 2029 के बाद संसद में राज्यों की राजनीतिक ताकत के संभावित संतुलन से जुड़ा बड़ा संवैधानिक और राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।

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क्यों महत्वपूर्ण है परिसीमन?
लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं और सीटों का वितरण समय-समय पर जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर तय किया जाता है। लेकिन संविधान के प्रावधानों के तहत लोकसभा सीटों के राज्यों के बीच पुनर्वितरण पर लंबे समय से रोक रही है।

अब जब जनगणना और भविष्य के परिसीमन को लेकर चर्चा तेज है, तमिलनाडु जैसे राज्य चाहते हैं कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने की कीमत उन्हें कम राजनीतिक प्रतिनिधित्व के रूप में न चुकानी पड़े।

यही वजह है कि तमिलनाडु विधानसभा का प्रस्ताव आने वाले समय में केंद्र और दक्षिण भारतीय राज्यों के बीच परिसीमन पर होने वाली बहस का एक महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।

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