भगवान शिव के वो आदि-अवतार, जिनके बिना नहीं हो सकती थी सृष्टि की रचना

Lord Shiva: शिवपुराण में महर्षि सूतजी और नन्दीश्वर के संवाद के माध्यम से भगवान शिव के दिव्य पंचब्रह्म (पंचमुख) अवतारों का विस्तृत वर्णन मिलता है। जब-जब ब्रह्माजी सृष्टि की रचना करने में असमर्थ हुए या ध्यानमग्न हुए, तब-तब महादेव ने अपने विभिन्न कल्पों में अवतार लेकर उन्हें सृष्टि सृजन की शक्ति और योगमार्ग का ज्ञान प्रदान किया।

शिवजी के ये पाँच आदि-अवतार सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान कहलाते हैं। इन पंचब्रह्म रूपों में न केवल ब्रह्मांड का संचालन छिपा है, बल्कि मानव शरीर की पंचज्ञानेन्द्रियों, पंचकर्मेन्द्रियों और पंचमहाभूतों का विज्ञान भी समाहित है।

1. सद्योजात अवतार (श्वेतलोहित कल्प)

उन्नीसवें ‘श्वेतलोहित कल्प’ में जब ब्रह्माजी परमब्रह्म के ध्यान में लीन थे, तब उनकी शिखा से एक श्वेत-रक्त वर्ण वाले कुमार उत्पन्न हुए। ब्रह्माजी ने उन्हें सद्योजात शिव समझकर प्रणाम किया। सद्योजात शिव की कृपा से सुनन्द, नन्दन, विश्वनन्द और उपनन्दन नामक चार ब्रह्मज्ञानी पुत्र प्रकट हुए। सद्योजात स्वरूप ने ही ब्रह्माजी को सृष्टि निर्माण का सामर्थ्य और परम ज्ञान प्रदान किया।

  • शरीर और ब्रह्मांडीय विज्ञान: सद्योजात रूप नासिका (घ्राणेन्द्रिय), उपस्थेन्द्रिय, गंध और पृथ्वी (भूमि) तत्व के अधिष्ठाता देव हैं।

2. वामदेव अवतार (रक्त कल्प)

बीसवें ‘रक्त कल्प’ में जब ब्रह्माजी पुत्र प्राप्ति की कामना से ध्यान में थे, तब उनसे रक्तवर्ण आभूषणों और वस्त्रों से सुसज्जित वामदेव शिव का प्रादुर्भाव हुआ। इनके पार्श्व से विरजा, विवाह, विशोक और विश्वभावन नामक चार तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुए। वामदेव शिव ने ब्रह्माजी को पुनः सृष्टि रचना की शक्ति प्रदान की।

  • शरीर और ब्रह्मांडीय विज्ञान: वामदेव रूप अहंकार का अधिष्ठान है तथा यह जिह्वा (रसनेन्द्रिय), पायु (उत्सर्जन अंग), रस और जल तत्व के स्वामी माने गए हैं।

3. तत्पुरुष अवतार (पीतवासा कल्प)

इक्कीसवें ‘पीतवासा कल्प’ में पीतांबरधारी ब्रह्माजी के ध्यान से महातेजस्वी तत्पुरुष शिव प्रकट हुए। उन्हें देखते ही ब्रह्माजी ‘शिवगायत्री मंत्र’ (तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि) का जप करने लगे। ब्रह्माजी की भक्ति से प्रसन्न होकर तत्पुरुष शिव ने योगमार्ग के प्रवर्तक पुत्रों को प्रकट किया।

  • शरीर और ब्रह्मांडीय विज्ञान: तत्पुरुष रूप जीवात्मा (क्षेत्रज्ञ) के भोग्य विषयों पर अधिकार रखता है। यह त्वचा (स्पर्शेन्द्रिय), पाणि (हाथ), स्पर्श और वायु तत्व के ईश्वर माने जाते हैं।

4. अघोर अवतार (शिव कल्प)

‘शिव कल्प’ में जब संपूर्ण जगत् जलमग्न था और ब्रह्माजी दुखी होकर सोच में पड़े थे, तब कृष्णवर्ण (काले वस्त्र, पगड़ी व मुकुटधारी) अघोर शिव का प्रादुर्भाव हुआ। ब्रह्माजी ने स्तुति करके अघोर रूप को प्रसन्न किया, जिसके बाद कृष्ण, कृष्णशिख, कृष्णास्य और कृष्णकण्ठधृक् नामक चार महात्मा प्रकट हुए, जिन्होंने ब्रह्माजी को अघोर योगमार्ग का उपदेश दिया।

  • शरीर और ब्रह्मांडीय विज्ञान: अघोर रूप अंतःकरण में बुद्धितत्व का विस्तार करता है। यह नेत्र/शरीर (दृष्टि), रूप, रस और अग्नि तत्व का अधिष्ठान है।

5. ईशान अवतार (विश्वरूप कल्प)

‘विश्वरूप कल्प’ में ब्रह्माजी के ध्यान करने पर सरस्वती देवी और शुद्ध स्फटिक के समान कांतिवाले सर्वव्यापी ईशान शिव प्रकट हुए। ईशान रूप ने जटी, मुण्डी, शिखण्डी और अर्धमुण्ड नामक योगियों को उत्पन्न कर सन्मार्ग और योगगति का उपदेश दिया।

  • शरीर और ब्रह्मांडीय विज्ञान: ईशान रूप प्रकृति का उपभोग करने वाले पुरुष (क्षेत्रज्ञ) को अधिकृत करता है। यह श्रोत्रेन्द्रिय (कान), वागिन्द्रिय (वाणी), शब्द और आकाश तत्व के सर्वोपरि ईश्वर हैं।

शिवपुराण के अनुसार, भगवान शिव के ये पाँचों रूप समस्त कल्याण के एकमात्र कारण हैं। जो मनुष्य नित्य नियम से भगवान शिव के इन पंचब्रह्म अवतारों की कथा सुनता या पढ़ता है, वह सांसारिक सुखों का उपभोग कर अंत में परमगति को प्राप्त होता है।

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