बड़े से बड़े पाप से मुक्ति दिलाती है ये कथा, जानिए कैसे मिला महापापी धुंधुकारी को मोक्ष?

Shrimad Bhagwat Katha: सनातन धर्म के महान ग्रंथों में शुमार श्रीमद्भागवत महापुराण केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि आत्मा का कल्याण करने वाला दिव्य अमृत है। श्रीमद्भागवत के माहात्म्य में गोकर्ण और उनके पापी भाई धुंधुकारी का प्रसंग वर्णित है।

यह पौराणिक कथा इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सच्ची श्रद्धा और भाव से किया गया भागवत कथा का श्रवण जीव को जन्म-मरण और प्रेत योनि के भयंकर कष्टों से मुक्त कराकर परमधाम वैकुंठ पहुंचा सकता है।

गोकर्ण और धुंधुकारी का जन्म

तुंगभद्रा नदी के तट पर आत्मदेव नामक एक विद्वान और धनवान ब्राह्मण अपनी पत्नी धुंधुली के साथ निवास करते थे। सर्वसुख संपन्न होने के बावजूद संतान न होने के दुख में आत्मदेव जब वन में गए, तो वहां एक सिद्ध संन्यासी ने उन्हें संतान प्राप्ति हेतु एक दिव्य फल प्रदान किया।

धुंधुली ने आशंकावश वह फल स्वयं न खाकर अपनी गाय को खिला दिया और अपनी बहन के बालक को अपना पुत्र बनाकर ले आई, जिसका नाम धुंधुकारी रखा गया। वहीं उस दिव्य फल के प्रभाव से गाय के गर्भ से एक अद्भुत बालक जन्मा, जिसके कान गाय के समान होने के कारण उसका नाम गोकर्ण पड़ा।

समय बीतने के साथ गोकर्ण अत्यंत विनम्र, ज्ञानी और भगवान के परम भक्त बने, जबकि धुंधुकारी अत्यंत क्रूर, लालची और पाप कर्मों में लिप्त रहने लगा। धुंधुकारी के अत्याचारों से तंग आकर पिता आत्मदेव वन चले गए और प्रभु भक्ति में लीन होकर देह त्याग दी। दूसरी ओर कुसंगति में पड़े धुंधुकारी की हत्या धन के लालच में वेश्याओं द्वारा कर दी गई। अपने कुकर्मों और अकाल मृत्यु के कारण धुंधुकारी भयंकर प्रेत योनि में चला गया।

7 गांठों वाले बांस में बैठकर सुनी कथा

तीर्थयात्रा से लौटे ज्ञानी गोकर्ण के समक्ष जब धुंधुकारी ने प्रेत रूप में प्रकट होकर रो-रोकर अपनी मुक्ति की गुहार लगाई, तब गोकर्ण जी ने सूर्यदेव की प्रेरणा से श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ का आयोजन किया।

चूंकि धुंधुकारी प्रेत रूप में था और सीधा बैठने में असमर्थ था, इसलिए वह कथा स्थल पर रखे 7 गांठों वाले एक सूखे बांस के भीतर वायु रूप में प्रविष्ट होकर बैठ गया। गोकर्ण जी के मुखारविंद से प्रतिदिन श्रीमद्भागवत का अमृत बरसता रहा। कथा के प्रभाव से प्रतिदिन बांस की एक-एक गांठ टूटती गई और सातवें दिन कथा पूर्ण होते ही सातों गांठें प्रचंड ध्वनि के साथ छिन्न-भिन्न हो गईं।

वैकुंठ से आया दिव्य विमान

सातवीं गांठ के टूटते ही धुंधुकारी प्रेत योनि के समस्त कष्टों से मुक्त हो गया। वह पीतांबरधारी, मस्तक पर मुकुट और गले में वैजयंती माला धारण किए दिव्य विष्णु पार्षद के रूप में प्रकट हुआ। उसने अपने भ्राता गोकर्ण के चरणों में प्रणाम कर भागवत कथा की महिमा का गुणगान किया।

तत्पश्चात वैकुंठ लोक से आए दिव्य विमान में बैठकर धुंधुकारी परमधाम चला गया। यह पौराणिक प्रसंग संदेश देता है कि संसार में पाप चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, प्रभु कथा, सत्संग और नाम जप में हर कलुष को धोकर मोक्ष प्रदान करने की क्षमता होती है।

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