
वॉट्सऐप पर चाइल्ड पोर्नोग्राफी आई तो फंसेंगे आप? जाने क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट…
Child Pornography: चाइल्ड पोर्नोग्राफी से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि, यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, (POCSO एक्ट 2012) के तहत अपराध के दायरे में आ सकता है।
देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने आज एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी (अश्लील सामग्री) देखना और उसे डाउनलोड करना बाल यौन अपराध संरक्षण यानी पॉक्सो (POCSO) कानून और सूचना प्रौद्योगिकी कानून (IT Act) के तहत अपराध है। इसके साथ ही CJI चंद्रचूड़, जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें कहा गया था कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी देखना और डाउनलोड करना पॉक्सो कानून और आईटी कानून के तहत अपराध नहीं है।
मद्रास उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में चेन्नई के 28 वर्षीय व्यक्ति को दोष मुक्त करते हुए कहा था कि निजी तौर पर बाल पोर्नोग्राफी देखना यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के दायरे में नहीं आता है.
चेन्नई पुलिस ने आरोपी का फोन जब्त कर पाया कि उसने चाइल्ड पोर्न वीडियो डाउनलोड कर अपने पास रखी थी. इसके बाद सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 बी और पॉक्सो अधिनियम की धारा 14(1) के तहत एक प्राथमिकी दर्ज की थी. भारत में, पॉक्सो अधिनियम 2012 और आईटी अधिनियम 2000, अन्य कानूनों के तहत, बाल पोर्नोग्राफी के निर्माण, वितरण और कब्जे को अपराध घोषित किया गया है.
न्यायमूर्ति एन. आनंद वेंकटेश की पीठ ने तर्क दिया कि अभियुक्त ने केवल सामग्री डाउनलोड की थी और निजी तौर पर पोर्नोग्राफी देखी थी और इसे न तो प्रकाशित किया गया था और न ही दूसरों के लिए प्रसारित किया गया था. ‘चूंकि उसने पोर्नोग्राफिक उद्देश्यों के लिए किसी बच्चे या बच्चों का इस्तेमाल नहीं किया है, इसलिए इसे अभियुक्त के नैतिक पतन के रूप में ही समझा जा सकता है.’





