उप्र की राजनीति में नया ध्रुवीकरण: भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष एके शर्मा बने इसके केंद्र बिंदु

भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष एके शर्मा

लखनऊ। पिछले कई सालों से उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण और भूमिहार राजनैतिक एवं आर्थिक रूप से हासिये पर जाते नज़र आ रहे हैं। किसी जमाने में कई बार ब्राह्मण मुख्यमंत्री रहे और हर बार कई दर्जन भूमिहार विधायक एवं मंत्री रहे।

आज की स्थिति यह है कि ब्राह्मण और भूमिहार बहुल सीटों पर भी अन्य जाति के लोग चुनाव लड़ और जीत रहे हैं। उसी प्रकार नेतृत्व में भी इन दोनों जातियों की उपेक्षा होती देखी जा रही है।

इतना ही नही इनके ऊपर शारीरिक अपराध एवं अन्य अत्याचार की घटनाएँ भी रोज़ ब रोज़ हो रही हैं। सर्वविदित है कि सैकड़ों ब्राह्मणों की हत्याएँ हाल में हुई हैं। इन जाति के अधिकारियों पर भी अन्याय और अत्याचार हुए।

ब्राह्मणों का कहना है कि इन घटनाओं एवं दुराचारों के पीछे शासन की शह और एक जाति विशेष का आक्रामक रवैया है। इस बात में काफ़ी तथ्य है ऐसा निष्पक्ष लोगों के द्वारा भी बताया जा रहा है।

ब्राह्मण यह भी कहते हैं कि विभिन्न पार्टियों ने उनका सिर्फ़ उपयोग किया। किसी ने कुछ दिया नही। भूमिहार उससे भी ज़्यादा नाराज़ हैं। भूमिहार खेती के आधार पर स्वयं सक्षम है इसलिए सरकार से उनकी सीधी उमीदें कम हैं लेकिन सम्मान की भूख तो है ही।

ये दोनों जातियाँ यह भी कह रही हैं कि पिछले दो-तीन दशकों में उनकी नेतागिरी कमजोर रही है। इसलिए नए नेता की तलाश थी जो भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष एके शर्मा के आने से सफल हो गयी। उनका यह अफसोस है कि उनकी बड़ी जनसंख्या होने के बावजूद अभी तक वो लोग विभाजनकारी राजनीति का शिकार होते रहे हैं।

ब्राह्मण कहते हैं कि सन् 2016 में तत्कालीन मुख्य सचिव उप्र सरकार आलोक रंजन की अध्यक्षता में राज्य सरकार ने प्रदेश में एक आंतरिक शासकीय सर्वे करवाया था जिसको सार्वजनिक नहीं किया गया लेकिन 2017 विधानसभा चुनाव इसी गणना के आँकड़ों का उपयोग करके लड़े गए।

उसी समय अ.भा. ब्राह्मण महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा 75 जिलों के ब्लॉक एवं गांव में निवास करने वाले ब्राह्मण समाज की सूची तत्कालीन सरकार से माँगी गयी थी। उस सर्वे में यह पाया गया कि ब्राह्मण समाज विभिन्न क्षेत्रों में प्रजाति और गोत्र के अनुसार विभाजित है।

जो कि मुख्य रूप से शुक्ला, द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी, दुबे, तिवारी, पांडेय, चौबे, उपाध्याय, पाठक,  मिश्रा, शास्त्री, विद्यार्थी, शर्मा, शांडिल्य, भारद्वाज, वशिष्ठ, पराशर, व्यास, भूमिहार-ब्राह्मण, बंदोपाध्याय,चटर्जी, बनर्जी, चक्रवर्ती, खत्री और खन्ना आदि में विभाजित हैं ।

ब्राह्मणों में तमाम उपजातियां भी शामिल हैं जिसमें भट्ट,गिरी, (गोसाई), गौड़ और मृत्यु उपरांत कर्मकांड कराने वाले ब्राह्मण (महापात्र) इत्यादि शामिल हैं।

कुछ प्रजातियों का भौगोलिक वर्गीकरण भी है। जैसे शाक्ल्यदीपी, सरयूपारी, कान्यकुब्ज। कुछ क्षेत्रों में लिखे जाने वाले सनाढ्य, पचौरी जैसे उपनाम, गोत्र और प्रवर भी ब्राह्मण समुदाय में शामिल हैं।

इनमें 3% भूमिहार (ब्राह्मण) भी है जिनमें त्यागी, राय, शाही, पांडेय, मिश्रा, शर्मा एवं सिंह लिखने वाले लोग है। ब्राह्मण एवं भूमिहार की उत्पत्ति एवं संस्कार एक हैं। भगवान परशुराम दोनों के आराध्य हैं।

इन दोनों में कोई मतभेद नही रहा। कोई कारण न होते हुए भी कई बार इनका राजनैतिक दृष्टिकोण अलग रहा है लेकिन अब इन दोनों जातियों ने एक साथ रहने का मन बना लिया है।

इस पुख़्ता तथ्यों के आधार पर इन दोनों जातियों ने अब ध्रुवीकरण  की साझा रणनीति अपनायी है। उन्होंने संगठित होकर  पुराने तथ्यों पर आधारित एक गणना की है।

इस आधार पर जो तथ्य उभरकर सामने आए उसमें यह प्रमाणित हो रहा है कि उप्र के कुल मतदाताओं का 17.8 प्रतिशत यानी 18 प्रतिशत या उससे से भी अधिक ब्राह्मण और भूमिहार मतदाता हैं। इस प्रकार किसी एक ख़ास जाती या वर्ग की बात की जाय तो अनुसूचित जाति के बाद सबसे बड़ा वर्ग ब्राह्मण-भूमिहार का है।

सर्वे का मुख्य आधार जिलों और तहसीलों में उपस्थित चुनाव हेतु जनगणना एवं पल्स पोलियो अभियान के तहत पारिवारिक विवरण एवं अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के सर्वे को तथा 2016 में उप्र में ब्राह्मणों की जनसंख्या प्रतिशत को आधार माना गया जिसके आधार पर पश्चिमी उप्र, बुंदेलखंड में ब्राह्मणों की संख्या कम तथा अवध प्रांत एवं पूर्वी उप्र में ब्राह्मण जनसंख्या घनत्व अधिक पाया गया।

पूर्वी उत्तर प्रदेश में तो ब्राह्मणों का प्रतिशत 23-24 तक जाता है। यही कारण है कि उप्र में वही पार्टी जीतती है और उसी पार्टी की सरकार होती है जिसको ब्राह्मण वर्ग का समर्थन हो। पहले कांग्रेस फिर बसपा और अब भाजपा।

इस प्रकार प्रदेश की आबादी का लगभग पाँचवाँ हिस्सा ब्राह्मण है। इनमें 30% परास्नातक, 20% स्नातक 10% इंटरमीडिएट एवं 20% हाई स्कूल पास तथा साक्षर हैं परंतु 30% ब्राह्मण-भूमिहार भूमिहीन, निर्धन एवं गरीब हैं। उनका जीवन स्तर दलितों से भी बदतर है।

इन जातियों में एक ख़ासियत यह है कि सभी समाज के लोग इनको प्रेम करते है। वैमनस्य इनके स्वभाव में नहि है। एके शर्मा का स्पष्ट रुप से एक ही मूल मंत्र है-सबका साथ सबका विकास।

इसीलिए एके शर्मा ब्राह्मण-भूमिहार के साथ-साथ अन्य जातियों के लिए भी आकर्षण के केंद्र बने हुए हैं। विशेष रूप से अनुसूचित जातियों के उपरांत अति पिछड़ी जातियों जैसे कि निषाद, गोड़, कुर्मी, मौर्य एवं राजभर नेताओं से उनके निकट के व्यक्तिगत सम्बंध विकसित हो गए हैं।

सनातन संस्कृति एवं पूजा पद्धति में पूर्ण डूबे हुए होने के साथ साथ एके शर्मा के स्वभाव में कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता देखने को मिलती है। देखना यह है कि इसका कितना लाभ भाजपा ले पाती है।

हाँ इतना तय है कि अब ब्राह्मण समुदाय एवं उनकी तमाम जातियाँ-प्रजातियाँ अपनी शक्ति विभाजित करना नहीं चाहती और न ही किसी का फुटबाल या पिछलग्गू बने रहना उन्हें स्वीकार्य है।

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