
सपा-कांग्रेस में सीट शेयरिंग पर घमासान! 86 सीटों के फॉर्मूले के सामने कांग्रेस की मांग 115
UP Election 2027 से पहले सीट शेयरिंग पर सपा-कांग्रेस में बढ़ी खींचतान, सपा के 86 सीटों के फॉर्मूले के सामने कांग्रेस की 105-115 सीटों की मांग; रायबरेली-अमेठी पर सबसे बड़ा पेंच.
UP Politics: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन को लेकर सियासी तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं है। दोनों दल साथ चुनाव लड़ने की बात कर रहे हैं, लेकिन सीट शेयरिंग को लेकर संभावित खींचतान ने सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, सपा करीब 86 विधानसभा सीटों के फॉर्मूले पर विचार कर रही है, जबकि कांग्रेस 105 से 115 सीटों पर दावा चाहती है।
दोनों दलों की मांग के बीच करीब 20 से 30 सीटों का अंतर है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या दोनों पार्टियां 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सीट बंटवारे पर सहमति बना पाएंगी?
क्या है सपा का 86 सीटों वाला फॉर्मूला?
रिपोर्टों के मुताबिक, समाजवादी पार्टी कांग्रेस को करीब 86 सीटें देने के फॉर्मूले पर विचार कर रही है। इसके तहत 2024 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के खाते में गई छह लोकसभा सीटों के अंतर्गत आने वाले विधानसभा क्षेत्रों में दो-दो सीटें देने और बाकी लोकसभा क्षेत्रों से एक-एक विधानसभा सीट देने की रणनीति बताई जा रही है।
इस गणित में छह लोकसभा सीटों से 12 विधानसभा सीटें और बाकी 74 लोकसभा क्षेत्रों से एक-एक सीट जोड़ने पर कुल 86 विधानसभा सीटें बनती हैं।
हालांकि, कांग्रेस इस फॉर्मूले से संतुष्ट नहीं बताई जा रही है। पार्टी 100 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी चाहती है।
रायबरेली-अमेठी पर क्यों फंसा है पेंच?
सीटों की कुल संख्या के अलावा असली विवाद सीटों की लोकेशन को लेकर है। खासतौर पर रायबरेली और अमेठी दोनों दलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
कांग्रेस के लिए रायबरेली-अमेठी सिर्फ चुनावी सीटें नहीं हैं, बल्कि इनका संबंध गांधी परिवार की राजनीतिक विरासत से भी रहा है। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी 2022 के विधानसभा चुनाव में इन क्षेत्रों में अपने प्रदर्शन और संगठन को आधार बनाकर कई सीटों पर दावा कर रही है।
रिपोर्टों के मुताबिक रायबरेली की ऊंचाहार और हरचंदपुर तथा अमेठी की गौरीगंज और अमेठी सीटों पर सपा की दावेदारी है। यही वजह है कि सीट बंटवारे की बातचीत में इन सीटों का मुद्दा संवेदनशील बन गया है।
2022 और 2024 के नतीजे होंगे अहम
सपा और कांग्रेस सीट शेयरिंग के दौरान पिछले चुनावों के प्रदर्शन को अपने-अपने पक्ष में इस्तेमाल कर सकते हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में जहां सपा ने कई सीटों पर अपनी पकड़ दिखाई थी, वहीं 2024 लोकसभा चुनाव में दोनों दलों के गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में बेहतर प्रदर्शन किया।
हालांकि, लोकसभा और विधानसभा चुनाव के समीकरण एक जैसे नहीं होते। विधानसभा चुनाव में स्थानीय उम्मीदवार, जातीय समीकरण, बूथ संगठन और क्षेत्रीय मुद्दे ज्यादा निर्णायक हो सकते हैं। इसलिए दोनों दल सीटों के चयन में अपने मौजूदा संगठन और स्थानीय ताकत को नजरअंदाज नहीं करना चाहेंगे।
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क्या टूट सकता है सपा-कांग्रेस गठबंधन?
फिलहाल सीट शेयरिंग को लेकर मतभेदों को गठबंधन टूटने का संकेत मानना जल्दबाजी होगी। दोनों दलों के लिए BJP के खिलाफ एकजुट विपक्ष की रणनीति राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
लेकिन अगर 86 बनाम 105-115 सीटों का अंतर बातचीत से खत्म नहीं होता और रायबरेली-अमेठी जैसी महत्वपूर्ण सीटों पर सहमति नहीं बनती, तो दोनों दलों के स्थानीय कार्यकर्ताओं और संभावित उम्मीदवारों के बीच टकराव बढ़ सकता है।
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2027 में सीटों से ज्यादा तालमेल की परीक्षा
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में सपा-कांग्रेस गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ सीटों की संख्या तय करना नहीं होगी। असली परीक्षा यह होगी कि दोनों दल एक-दूसरे के मजबूत क्षेत्रों और राजनीतिक दावों का कितना सम्मान करते हैं।
अगर सपा और कांग्रेस समय रहते सीट शेयरिंग का फॉर्मूला तय कर लेते हैं तो विपक्ष एक स्पष्ट चुनावी रणनीति के साथ मैदान में उतर सकता है। लेकिन रायबरेली, अमेठी और दूसरी महत्वपूर्ण सीटों पर खींचतान बढ़ी तो इसका असर गठबंधन के जमीनी तालमेल पर भी पड़ सकता है।
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