क्या फिर जलेंगे लकड़ी के चूल्हे? उज्ज्वला योजना के नए नियम से बढ़ी गरीब परिवारों की टेंशन

Ujjwala Yojna Rule Change: प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) को केंद्र सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी और चर्चित योजनाओं में गिना जाता है। वर्ष 2016 में शुरू की गई इस योजना का मुख्य उद्देश्य गरीब परिवारों, खासकर ग्रामीण महिलाओं को धुएं वाले पारंपरिक चूल्हों से मुक्ति दिलाकर स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराना था।
इस योजना के तहत करोड़ों महिलाओं को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन दिए गए और इसे महिला स्वास्थ्य, स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम बताया गया।

लेकिन अब सरकार के एक नए फैसले ने उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों की चिंता बढ़ा दी है। सरकार ने योजना के तहत मिलने वाले सब्सिडी वाले गैस सिलेंडरों की संख्या घटाकर 9 से सिर्फ 4 कर दी है। ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि बढ़ती महंगाई और महंगे गैस सिलेंडरों के बीच क्या गरीब परिवार फिर से लकड़ी, उपले और कोयले जैसे पारंपरिक ईंधनों की ओर लौटने को मजबूर होंगे?

कैसे घटती गई सब्सिडी?
उज्ज्वला योजना की शुरुआत के बाद सरकार ने गरीब परिवारों को रसोई गैस अपनाने के लिए सब्सिडी का लाभ दिया था। शुरुआत में सालाना 12 सिलेंडरों तक सब्सिडी का फायदा मिलता था। बाद में यह संख्या घटाकर 9 कर दी गई और अब इसे सिर्फ 4 सिलेंडरों तक सीमित कर दिया गया है।

साल 2022 में सरकार ने उज्ज्वला लाभार्थियों को 14.2 किलो के प्रत्येक एलपीजी सिलेंडर पर 200 रुपये की सब्सिडी देना शुरू किया था। यह राशि सिलेंडर भरवाने के बाद सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में भेजी जाती थी। इसके बाद अक्टूबर 2023 में सब्सिडी की राशि बढ़ाकर 300 रुपये प्रति सिलेंडर कर दी गई। हालांकि अब यह राहत केवल पहले चार सिलेंडरों तक ही सीमित कर दी गई है। इसके बाद उपभोक्ताओं को पूरी कीमत चुकानी होगी।

महंगाई ने बढ़ाई मुश्किल
यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब घरेलू एलपीजी सिलेंडरों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। कई राज्यों में घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत 900 रुपये से ऊपर पहुंच चुकी है। ऐसे में सीमित आय वाले परिवारों के लिए बार-बार गैस भरवाना मुश्किल होता जा रहा है।

ग्रामीण इलाकों में रहने वाले कई परिवारों का कहना है कि गैस कनेक्शन तो मिल गया, लेकिन लगातार बढ़ती कीमतों के कारण सिलेंडर भरवाना अब उनकी पहुंच से बाहर होता जा रहा है। कई जगहों पर लोग सिर्फ खास मौकों या मेहमानों के आने पर ही गैस का इस्तेमाल करते हैं, जबकि रोजमर्रा के खाना बनाने के लिए फिर से लकड़ी और चूल्हों का सहारा लिया जा रहा है।

महिलाओं के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर गरीब परिवार गैस सिलेंडर भरवाने में सक्षम नहीं रहे तो इसका सबसे बड़ा असर महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ेगा। पारंपरिक चूल्हों से निकलने वाला धुआं सांस और आंखों से जुड़ी कई गंभीर बीमारियों का कारण बनता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) समेत कई संस्थाएं पहले भी यह कह चुकी हैं कि ठोस ईंधनों से निकलने वाला धुआं महिलाओं के लिए बेहद खतरनाक है। ऐसे में उज्ज्वला योजना का उद्देश्य केवल गैस कनेक्शन देना नहीं बल्कि लोगों को लंबे समय तक स्वच्छ ईंधन इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करना भी था।

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विपक्ष ने उठाए सवाल
सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या घटाने के फैसले को लेकर विपक्षी दलों ने भी सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। विपक्ष का कहना है कि सरकार एक तरफ गरीबों के कल्याण की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ रसोई गैस जैसी जरूरी चीजों पर राहत कम कर रही है।

विपक्षी नेताओं का आरोप है कि बढ़ती महंगाई के बीच यह फैसला गरीब परिवारों की मुश्किलें और बढ़ाएगा। उनका कहना है कि उज्ज्वला योजना तभी सफल मानी जाएगी जब गरीब परिवार नियमित रूप से गैस सिलेंडर भरवा सकें।

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क्या फिर लौटेंगे धुएं वाले चूल्हे?
विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि अगर गैस सिलेंडर भरवाने की लागत लगातार बढ़ती रही और सब्सिडी का दायरा सीमित होता गया, तो आने वाले समय में कई गरीब परिवार फिर से पारंपरिक चूल्हों की ओर लौट सकते हैं।

ऐसी स्थिति में उज्ज्वला योजना का मूल उद्देश्य प्रभावित हो सकता है। योजना ने करोड़ों घरों तक गैस पहुंचाने में सफलता जरूर हासिल की, लेकिन अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि गरीब परिवार नियमित रूप से इस सुविधा का उपयोग कर पाएं।

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