कौन हैं गरुड़ पुराण के सात पितृ देवता? जानिए उत्पत्ति, प्रकार और प्रसन्न करने के उपाय

Garuda Puran Pitru Devta: सनातन धर्म में मृत्यु के बाद जीवात्मा की गति और पितृ लोक का विस्तृत वर्णन गरुड़ पुराण में मिलता है। भगवान विष्णु ने अपने वाहन पक्षीराज गरुड़ को जो ज्ञान दिया था, उसमें पितरों की महिमा का उल्लेख है।

सामान्यतः लोग समझते हैं कि केवल दिवंगत माता-पिता या दादा-दादी ही पितर होते हैं, लेकिन गरुड़ पुराण स्पष्ट करता है कि पितृगण देवताओं की एक विशेष श्रेणी हैं जो अलग लोक में निवास करते हैं और उनकी मुख्य रूप से 7 श्रेणियां होती हैं।

पितृ देवताओं की उत्पत्ति कैसे हुई?

सृष्टि के आरंभ में जब ब्रह्मा जी ने संसार की रचना की, तब उन्होंने विचार किया कि मृत्यु के पश्चात जीवों के कर्मों का लेखा-जोखा रखने और उनके वंश की रक्षा करने का दायित्व किसे दिया जाए। इसके लिए ब्रह्मा जी ने अपनी दाईं ओर से 7 महाऋषियों को प्रकट किया। इन्हीं ऋषियों से वसु, रुद्र और आदित्य के संयोग द्वारा 7 पितृ गणों की उत्पत्ति हुई, जिन्हें पितृ देवता कहा गया।

गरुड़ पुराण के अनुसार पितृ देवता

सोमपा पितर सोमरस का पान करने वाले और चंद्रलोक में निवास करने वाले पितर हैं, जो वेदपाठी और ज्ञानवान ब्राह्मणों के पितर माने जाते हैं। हविष्मान पितर यज्ञ की हवि से तृप्त होकर स्वर्ग लोक में निवास करते हैं और क्षत्रियों व धर्मपरायण शासकों के पितर कहलाते हैं। आज्यपा पितर घृत यानी घी का पान करने वाले वैश्यों के पितर होते हैं, जो ईमानदारी से व्यापार और दान-पुण्य करने वाले वंशजों से प्रसन्न रहते हैं।

सुकालिन पितर काल का ज्ञान रखने वाले अत्यंत दयालु पितर होते हैं जो सेवाभावी लोगों के पितर कहलाते हैं। अग्निष्वात्त पितर योगियों, संन्यासियों और ध्यानियों के पितर माने जाते हैं जो ब्रह्मलोक में निवास करते हैं और इनकी तृप्ति से जीव को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

बर्हिषद पितर कुशा के आसन पर विराजमान होने वाले सभी साधारण गृहस्थों के पितर होते हैं, जिनमें हमारे अपने पूर्वज जैसे पिता, दादा और परदादा आते हैं। वहीं कव्यवाड पितर सबसे नवीन पितर होते हैं जो मृत्यु के बाद 1 वर्ष तक प्रेत योनि से मुक्त होकर पितर बनते हैं और इन्हें श्राद्ध के अन्न की सबसे अधिक आवश्यकता होती है।

पितरों का स्वरूप और निवास लोक

गरुड़ पुराण के अनुसार पितृलोक चंद्रमा के ऊपरी भाग में स्थित है, जहां समय का चक्र पृथ्वी से अलग होता है। गरुड़ पुराण के 10वें अध्याय में बताया गया है कि दिव्य पितर श्वेत वस्त्र, जनेऊ और प्रसन्न मुख मुद्रा में हाथ में कमंडल लिए दिखाई देते हैं, जबकि श्राद्ध न पाने वाले प्रेत पितर भूख और प्यास से पीड़ित दिखाई देते हैं।

वंशजों द्वारा दिया गया तिल और जल पितरों की प्यास बुझाता है, जबकि ब्राह्मण, गाय और कौवे को कराया गया भोजन सीधे पितृलोक में उनके भोजन के रूप में परिवर्तित हो जाता है।

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पितृ दोष के लक्षण और प्रसन्न करने के उपाय

यदि घर में बिना कारण गृहक्लेश, संतान प्राप्ति में बाधा, बार-बार स्वास्थ्य खराब होना या नौकरी-कारोबार में अचानक रुकावटें आ रही हों, तो यह पितृ दोष का संकेत हो सकता है। गरुड़ पुराण के अनुसार बिहार के गया जी में पिंडदान करने से 21 पीढ़ियों के पितरों का उद्धार होता है।

इसके अलावा प्रत्येक अमावस्या तथा भाद्रपद-आश्विन के 16 दिनों के पितृ पक्ष में पितरों के नाम जल, तिल और कुश से तर्पण करना चाहिए। पीपल के वृक्ष में जल चढ़ाना और संध्या समय दीपक जलाना पितरों को शांति प्रदान करता है।

श्रीमद्भगवद्गीता के 7वें अध्याय का नियमित पाठ करने से पितरों को सीधे सद्गति और मोक्ष मिलता है। साथ ही ‘ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः॥’ मंत्र का नित्य जाप करने से पितृ देव सदैव प्रसन्न रहते हैं।

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