किसने शुरू की श्राद्ध की परंपरा? जानिए महाभारत से जुड़ी पौराणिक कथा

Pitru Paksha 2026: सनातन धर्म में पितृ पक्ष और श्राद्ध का विशेष धार्मिक महत्व है। अपने पूर्वजों और पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए पिंडदान व तर्पण की परंपरा सदियों से चली आ रही है। हालांकि बहुत कम लोग जानते हैं कि श्राद्ध की शुरुआत सबसे पहले किसने की थी और यह परंपरा आम जनमानस तक कैसे पहुंची।

महाभारत के अनुशासन पर्व में पितामह भीष्म ने महाराज युधिष्ठिर को श्राद्ध के उद्भव और इससे जुड़ी बेहद दिलचस्प पौराणिक कथा का वर्णन किया है।

महर्षि निमि ने की थी श्राद्ध की शुरुआत

महाभारत के अनुसार, सबसे पहले श्राद्ध करने का उपदेश महातपस्वी अत्रि मुनि ने महर्षि निमि को दिया था। अत्रि मुनि के मार्गदर्शन में महर्षि निमि ने प्रथम बार अपने पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध का आयोजन किया। इसके बाद अन्य ऋषियों-महर्षियों ने भी इस परंपरा को अपनाया और धीरे-धीरे चारों वर्णों के लोग अपने पितरों को अन्न तथा जल अर्पित करने लगे।

नियमित रूप से श्राद्ध का भोजन ग्रहण करने के कारण एक समय ऐसा आया कि सभी देवता और पितर पूरी तरह तृप्त हो गए। हालांकि, लगातार भारी और गरिष्ठ भोजन करने से पितरों को अजीर्ण (भोजन न पचने का रोग) हो गया, जिससे वे कष्ट में आ गए।

जब पितरों को हुआ अजीर्ण रोग

अजीर्ण रोग से पीड़ित होकर देवता और पितर ब्रह्माजी के पास पहुंचे और अपने कष्ट के निवारण की प्रार्थना की। ब्रह्माजी ने उन्हें अपने समीप बैठे अग्निदेव के पास भेजा। तब अग्निदेव ने समाधान बताते हुए कहा कि अब से श्राद्ध में अर्पित किए जाने वाले भोजन का पहला भाग अग्नि को दिया जाएगा। अग्निदेव के साथ भोजन ग्रहण करने से पितरों का अजीर्ण दूर हो गया। इसी कारण आज भी श्राद्ध प्रक्रिया में सबसे पहले अग्नि में आहुति (अग्नि का भाग) देने का नियम है।

अग्नि में हवन करने के बाद दिए गए पिंडदान को कोई भी आसुरी शक्ति या ब्रह्मराक्षस दूषित नहीं कर पाते हैं। श्राद्ध की शास्त्रीय विधि के अनुसार सबसे पहले पिता, फिर दादा (पितामह) और उसके बाद परदादा (प्रपितामह) के नाम से पिंड अर्पित करना चाहिए। पिंडदान करते समय एकाग्रचित्त होकर गायत्री मंत्र और ‘सोमाय पितृमते स्वाहा’ का जाप करने का विधान है।

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पिंडदान के तीन पिंडों का रहस्य

महाभारत में श्राद्ध के दौरान दिए जाने वाले तीन पिंडों के उपयोग का भी विशेष विधान बताया गया है:

  1. पहला पिंड (जल में): पहला पिंड जल में प्रवाहित किया जाता है, जो चंद्रमा को तृप्त करता है और चंद्रमा के माध्यम से देव व पितर संतुष्ट होते हैं।

  2. दूसरा पिंड (पत्नी के लिए): दूसरा पिंड गृहस्थ की पत्नी को खिलाया जाता है, जिससे प्रसन्न होकर पितर उत्तम और योग्य संतान का आशीर्वाद देते हैं।

  3. तीसरा पिंड (अग्नि में): तीसरा पिंड अग्निदेव को समर्पित किया जाता है, जिससे तृप्त होकर पितर मनुष्य की समस्त मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

अमावस्या तिथि को श्राद्ध और तर्पण करना बेहद अनिवार्य माना गया है। मान्यताओं के अनुसार, पितरों की भक्ति से मनुष्य को आयु, आरोग्य, बल, यश और धन की प्राप्ति होती है।

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