The India Story Review: थाली से कोर्ट तक की कानूनी लड़ाई, मुद्दा गंभीर पर ढीली पड़ी स्क्रिप्ट

श्रेयस तलपड़े और काजल अग्रवाल स्टारर 'द इंडिया स्टोरी' खाने में मिलावट और जहरीले कीटनाशकों के गंभीर मुद्दे पर बनी है।

The India Story Review: अगर आपकी रोज की थाली में परोसा जाने वाला खाना ही धीरे-धीरे मीठा जहर बन जाए तो क्या होगा? निर्देशक चेतन डीके इसी संवेदनशील और गंभीर सवाल को पर्दे पर लेकर आए हैं। श्रेयस तलपड़े और काजल अग्रवाल स्टारर फिल्म द इंडिया स्टोरी’ एक पिता की वह लड़ाई दिखाती है, जो अपनी मासूम बच्ची की कैंसर से हुई मौत के लिए सरकार, कीटनाशक बनाने वाली मल्टीनेशनल कंपनियों और मिलावटी व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराता है।

क्या है फिल्म की कहानी?

फिल्म की पूरी कहानी पूर्व सैनिक मेजर योगेश पाटिल (श्रेयस तलपड़े) के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसकी छोटी सी बेटी परी (तृषा सरदा) कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से दम तोड़ देती है। योगेश का मानना है कि उसकी मासूम बच्ची की जान किसी बीमारी ने नहीं, बल्कि सब्जियों में छिड़के जाने वाले जहरीले केमिकल्स, मिलावटी दूध और फसलों में इस्तेमाल हो रहे खतरनाक कीटनाशकों ने ली है।

जब व्यवस्था और पुलिस उसका साथ नहीं देती, तब एडवोकेट अर्चना (काजल अग्रवाल) उसका केस हाथ में लेती हैं। इसके बाद अदालत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों, सरकार और सिस्टम के खिलाफ एक लंबी कानूनी जंग छिड़ जाती है, जो पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर देती है।

फिल्म का प्लस और माइनस पॉइंट

फिल्म का सबसे मजबूत पहलू इसका टॉपिक है। फसलों में यूरिया, दूध में मिलावट और पंजाब की मशहूर ‘कैंसर ट्रेन’ जैसी वास्तविक घटनाओं का जिक्र कहानी को काफी गंभीर और वास्तविक बनाता है।

श्रेयस तलपड़े ने एक लाचार, टूटे हुए लेकिन हार न मानने वाले पिता के दर्द को बड़ी ईमानदारी से पर्दे पर उतारा है। वहीं काजल अग्रवाल वकील और मां के दोहरे किरदार में असर छोड़ती हैं। छोटी परी बनी तृषा सरदा ने अपनी मासूमियत से सबका दिल जीत लिया है।

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कहां मात खा गई फिल्म?

इतने बड़े और संवेदनशील मुद्दे के बावजूद कोर्टरूम सीन काफी सपाट नजर आते हैं। जिस तरह के जोरदार सवाल-जवाब या बहस की उम्मीद एक कोर्टरूम ड्रामा में होती है, वह यहां नदारद है। दूसरे हाफ में अस्पताल के लंबे इमोशनल सीन कहानी की रफ्तार को काफी धीमा कर देते हैं। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर और संगीत औसत है। क्लाइमैक्स भी उतना असरदार नहीं बन पाया, जितने बड़े पैमाने पर यह मुद्दा उठाया गया था।

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देखें या न देखें?

अगर आप गंभीर, सामाजिक विषयों पर बनी फिल्में पसंद करते हैं और श्रेयस तलपड़े-काजल अग्रवाल के फैन हैं, तो इसे एक बार देखा जा सकता है। हालांकि, एक बेहद रोमांचक और सस्पेंस से भरा कोर्टरूम ड्रामा देखने की चाह रखने वालों को निराशा हाथ लग सकती है।

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