शिव जी ने क्यों काटा था ब्रह्मा जी का पाँचवाँ सिर और भुगतना पड़ा परिणाम?

Shiv Puran Katha: सनातन धर्म ग्रंथों और पौराणिक कथाओं में भगवान शिव के विविध स्वरूपों और उनकी लीलाओं का गहन वर्णन मिलता है। शिव पुराण में वर्णित एक अत्यंत प्रसिद्ध और रहस्यमयी कथा के अनुसार, सृष्टि के आरंभ काल में ब्रह्मा जी के चार नहीं बल्कि पाँच सिर हुआ करते थे।

परंतु एक ऐसी घटना घटी जिसके कारण भगवान शिव के उग्र रूप कालभैरव ने ब्रह्मा जी का पाँचवाँ सिर काट दिया। इस घटना के बाद स्वयं कालभैरव को भी एक भयंकर दोष का परिणाम भुगतना पड़ा और तीनों लोकों में प्रायश्चित यात्रा करनी पड़ी थी।

श्रेष्ठता का अहंकार

शिव पुराण के वर्णन के अनुसार, सृष्टि के शुरुआती दौर में ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु के बीच अपनी-अपनी श्रेष्ठता और सामर्थ्य को लेकर मतभेद उत्पन्न हो गया। दोनों देव स्वयं को सर्वोपरि मान रहे थे। इसी दौरान उनके समक्ष एक अत्यंत दिव्य और अनंत प्रकाशपुंज प्रकट हुआ, जिसका न तो कोई आदि था और न ही कोई अंत। यह अनंत ज्योतिर्मय स्वरूप वास्तव में देवाधिदेव महादेव शिव का ही परम रूप था। जब ब्रह्मा और विष्णु दोनों ही उस दिव्य प्रकाश की वास्तविक सीमा और अंत खोजने में असमर्थ रहे, तब दोनों के सामने उनके अहंकार की परीक्षा का समय आ गया।

कालभैरव का प्राकट्य

इस ज्योतिर्मय स्तंभ के प्रकट होने के बाद भी ब्रह्मा जी के भीतर अभिमान शांत नहीं हुआ। उनके पाँचवें सिर ने भगवान शिव के प्रति विनम्रता त्यागकर अत्यंत अहंकार भरे शब्द कहे और शिव जी को अपने से ही उत्पन्न हुआ बताने का प्रयास किया। ब्रह्मा जी के इस कृत्य और अहंकार को देखकर भगवान शिव के क्रोध से एक अत्यंत भयानक और तेजस्वी रूप प्रकट हुआ, जिन्हें ‘कालभैरव’ कहा जाता है।

शरीर पर सर्पों के आभूषण धारण किए और हाथ में त्रिशूल लिए प्रकट हुए कालभैरव को भगवान शिव ने ब्रह्मा के उस अहंकार से भरे पाँचवें सिर को दंडित करने का आदेश दिया। आज्ञा मिलते ही कालभैरव ने एक ही क्षण में ब्रह्मा जी का पाँचवाँ मस्तक काट दिया।

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ब्रह्महत्या का दोष

ब्रह्मा जी का सिर कटते ही कथा में एक नया और विकट मोड़ आया। सिर काटने के बाद ब्रह्मा जी का वह कटा हुआ कपाल (खोपड़ी) कालभैरव के हाथ से चिपक गया और अलग नहीं हुआ। कालभैरव पर ब्रह्महत्या का भयंकर दोष लग गया, जो एक अदृश्य और भयानक शक्ति के रूप में उनका पीछा करने लगा। इसके बाद कालभैरव हाथ में ब्रह्मा का कपाल लिए तीनों लोकों में भटकने लगे और अनेक पवित्र तीर्थों का भ्रमण किया।

भिक्षाटन करते हुए कालभैरव का यह रूप पौराणिक मान्यताओं में ‘कापालिक’ परंपरा का मूल माना जाता है। समस्त शक्तियों के स्वामी होने के बावजूद कालभैरव कर्म के नियम और प्रायश्चित की प्रक्रिया से गुजरे। इस यात्रा के दौरान वे भगवान विष्णु के पास भी पहुंचे, जिन्होंने कालभैरव का आदर-सत्कार कर उनकी स्तुति की।

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काशी का कपालमोचन तीर्थ

तीनों लोकों की कठिन यात्रा के बाद जब कालभैरव सनातन परंपरा में मोक्षदायिनी मानी जाने वाली नगरी ‘काशी’ की सीमा में प्रविष्ट हुए, तब एक अद्भुत चमत्कार हुआ। काशी की पवित्र भूमि पर कदम रखते ही कालभैरव का पीछा कर रहा ब्रह्महत्या का दोष स्वतः समाप्त हो गया और ब्रह्मा जी का वह कटा हुआ कपाल भी उनके हाथ से छूटकर भूमि पर गिर गया।

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काशी में जिस स्थान पर ब्रह्मा जी का कपाल हाथ से गिरा था, उसे ही आज ‘कपालमोचन तीर्थ’ के नाम से जाना जाता है। शिव पुराण की यह कथा स्पष्ट संदेश देती है कि अहंकार चाहे ब्रह्मा जैसे सृष्टिकर्ता का ही क्यों न हो, उसका अंत निश्चित है। वहीं, स्वयं कालभैरव का प्रायश्चित रूप यह सिखाता है कि हर कर्म का परिणाम भोगना अनिवार्य है और ज्ञान व शक्ति के साथ विनम्रता ही जीवन का सच्चा आधार है।

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