
सऊदी के साथ हूतियों से जंग में उतरेगा पाकिस्तान? जानें क्यों आसान नहीं है ये लड़ाई
पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रक्षा सहयोग अब यमन के हूती विद्रोहियों के चलते चर्चा में है। मक्का रक्षा समझौते के सक्रिय होने के बाद पाकिस्तान के सामने सऊदी अरब की सुरक्षा में बड़ी भूमिका निभाने की चुनौती है। लेकिन अगर मामला सीधे हूतियों से सैन्य टकराव तक पहुंचता है, तो पाकिस्तान के लिए यह आसान जंग नहीं होगी।
Yemen: यमन में एक बार फिर संघर्ष का माहौल है। एक ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सऊदी समर्थित सरकार है, वहीं दूसरी ओर ईरान समर्थित हूती विद्रोही हैं। पिछले कई वर्षों से चल रहे इस संघर्ष में सऊदी अरब हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करता रहा है, लेकिन हूती संगठन अब भी अपनी मजबूत स्थिति बनाए हुए है।
ऐसे में पाकिस्तान के लिए सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि उसके पास कितनी सैन्य ताकत है, बल्कि यह भी है कि वह यमन जैसे जटिल युद्धक्षेत्र में हूतियों का सामना कैसे करेगा।
हूती विद्रोही कौन हैं?
हूतियों को आधिकारिक तौर पर अंसार अल्लाह कहा जाता है। यह संगठन उत्तरी यमन के सादा क्षेत्र से उभरा और ज़ैदी शिया समुदाय से जुड़ा है।
1990 के दशक में हूती आंदोलन ने राजनीतिक और धार्मिक गतिविधियों के जरिए अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू की। इसके बाद संगठन ने यमनी सरकार के खिलाफ कई विद्रोह किए।
2014 में हूतियों ने यमन की राजधानी सना पर कब्जा कर लिया। इसके बाद देश में गृहयुद्ध शुरू हुआ और यमन राजनीतिक तथा सैन्य रूप से कई हिस्सों में बंट गया।
पाकिस्तान के लिए पहली चुनौती- यमन का भूगोल
हूतियों से मुकाबले में पाकिस्तान की पहली बड़ी समस्या यमन का कठिन भूगोल होगा।
उत्तरी यमन में पहाड़ी इलाके हैं, जहां हूती लड़ाकों को स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों की अच्छी जानकारी है। वे पहाड़ों और दुर्गम इलाकों में अपनी मौजूदगी बनाए रखते हुए अचानक हमले कर सकते हैं।
ऐसे इलाके में किसी बाहरी सेना के लिए पारंपरिक सैन्य रणनीति लागू करना आसान नहीं होता।
दूसरी चुनौती- ड्रोन और मिसाइल
हूतियों ने पिछले वर्षों में ड्रोन और मिसाइलों को अपनी सैन्य रणनीति का अहम हिस्सा बनाया है।
कम लागत वाले ड्रोन और मिसाइलों के जरिए वे काफी दूरी पर स्थित ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश कर सकते हैं। इससे सऊदी अरब के एयरबेस, तेल प्रतिष्ठान, एयरपोर्ट और अन्य महत्वपूर्ण ढांचे खतरे में आ सकते हैं।
अगर पाकिस्तान सऊदी अरब की सुरक्षा में सक्रिय भूमिका निभाता है तो एयर डिफेंस और ड्रोन-विरोधी तकनीक उसकी प्राथमिकताओं में शामिल हो सकती है।
तीसरी चुनौती- गुरिल्ला युद्ध
पाकिस्तान के लिए सबसे कठिन पहलू हूतियों की युद्ध शैली हो सकती है।
हूती किसी पारंपरिक सेना की तरह केवल टैंक, तोप और सैनिकों के साथ खुले मैदान में युद्ध नहीं लड़ते। वे गुरिल्ला और असममित युद्ध की रणनीति अपना सकते हैं।
इसमें छोटे समूहों से हमला, ड्रोन का इस्तेमाल, मिसाइल लॉन्च करना और तुरंत सुरक्षित इलाकों में लौटना शामिल है।
इस तरह के युद्ध में किसी बड़ी सैन्य ताकत को निर्णायक जीत हासिल करने में काफी समय लग सकता है।
ईरान के समर्थन से बढ़ेगी चुनौती
हूतियों के साथ ईरान का संबंध इस संघर्ष को और संवेदनशील बनाता है।
अगर पाकिस्तान सीधे हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान में शामिल होता है, तो उसका सामना अप्रत्यक्ष रूप से ईरान समर्थित नेटवर्क से भी हो सकता है। इससे संघर्ष का दायरा यमन से बाहर जाने का खतरा बढ़ सकता है।
पाकिस्तान के लिए यह स्थिति इसलिए भी मुश्किल होगी क्योंकि वह ईरान के साथ अपने संबंधों को खराब नहीं करना चाहेगा।
लाल सागर का मोर्चा भी अहम
यमन की भौगोलिक स्थिति उसे रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है। यहां बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य है, जो लाल सागर और अदन की खाड़ी के बीच समुद्री संपर्क प्रदान करता है।
इस रास्ते से वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। यदि हूतियों और सऊदी समर्थित ताकतों के बीच संघर्ष बढ़ता है तो इसका असर समुद्री व्यापार, जहाजों की आवाजाही और ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ सकता है।
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क्या पाकिस्तान यमन में सेना भेजेगा?
मक्का रक्षा समझौते के सक्रिय होने के बाद यह सवाल सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है। लेकिन सऊदी अरब की रक्षा में पाकिस्तान की भूमिका का अर्थ यह जरूरी नहीं है कि पाकिस्तानी सैनिक सीधे यमन में जाकर हूतियों से जंग लड़ेंगे।
पाकिस्तान की भूमिका सऊदी क्षेत्र की सुरक्षा, एयर डिफेंस, निगरानी, खुफिया सहयोग और सैन्य सहायता तक सीमित रह सकती है।
सीधे यमन में प्रवेश करना पाकिस्तान के लिए सैन्य के साथ-साथ राजनीतिक और कूटनीतिक जोखिम भी पैदा कर सकता है।
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सऊदी अरब को पाकिस्तान से क्या फायदा?
पाकिस्तान की सैन्य क्षमता और सऊदी अरब के साथ उसके पुराने रक्षा संबंध उसे इस संकट में महत्वपूर्ण साझेदार बनाते हैं।
सऊदी अरब को पाकिस्तानी विशेषज्ञता का फायदा प्रशिक्षण, एयर डिफेंस, खुफिया जानकारी और सैन्य योजना जैसे क्षेत्रों में मिल सकता है।
हालांकि, पाकिस्तान के लिए संतुलन बनाए रखना जरूरी होगा, क्योंकि वह सऊदी अरब की सुरक्षा प्रतिबद्धता निभाते हुए क्षेत्रीय युद्ध में सीधे फंसने से बचना चाहेगा।
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