रूस-तालिबान की नई दोस्ती से पाकिस्तान परेशान, भारत के लिए क्या हैं संकेत?

Russia-Taliban Defense Agreement: रूस और तालिबान के बीच हुए नए रक्षा समझौते ने दक्षिण एशिया और मध्य एशिया की राजनीति में बड़ा बदलाव ला दिया है। कभी अफगानिस्तान में एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन रहे रूस और तालिबान अब रणनीतिक साझेदार बनते दिखाई दे रहे हैं। मॉस्को में आयोजित ‘इंटरनेशनल सिक्योरिटी फोरम’ में दोनों पक्षों के बीच सैन्य सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी, जिसने वैश्विक कूटनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।

तालिबान के रक्षा मंत्री मोहम्मद याकूब की मौजूदगी में हुए इस समझौते को रूस द्वारा तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता देने के बाद सबसे बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि रूस अब अफगानिस्तान में अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत करने के मिशन पर तेजी से आगे बढ़ रहा है।

रूस क्यों बढ़ा रहा तालिबान से रिश्ते?
विशेषज्ञों के मुताबिक रूस अफगानिस्तान को अब केवल सुरक्षा चुनौती के तौर पर नहीं, बल्कि क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने के अवसर के रूप में देख रहा है। यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी देशों के साथ तनाव के बीच रूस एशिया में नए साझेदार तलाश रहा है।

तालिबान के साथ बढ़ती नजदीकी रूस को मध्य एशिया में अपनी स्थिति मजबूत करने में मदद कर सकती है। इसके अलावा रूस इस्लामिक स्टेट खुरासान (ISIS-K) जैसे आतंकी संगठनों के खतरे को लेकर भी चिंतित है और तालिबान को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए उपयोगी साझेदार मान रहा है।

अफगानिस्तान की सैन्य क्षमता होगी मजबूत
रक्षा समझौते के तहत अफगानिस्तान को सैन्य प्रशिक्षण, हथियार प्रणाली, एयर डिफेंस और तकनीकी सहयोग मिलने की संभावना जताई जा रही है। माना जा रहा है कि रूस तालिबान शासन को सीमित स्तर पर सैन्य उपकरण और रक्षा ढांचा विकसित करने में सहायता कर सकता है।

यदि ऐसा होता है तो तालिबान की सैन्य ताकत पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो सकती है। खासतौर पर अफगानिस्तान की हवाई क्षमता बढ़ने से पूरे क्षेत्र में शक्ति संतुलन प्रभावित हो सकता है।

पाकिस्तान के लिए क्यों बढ़ी परेशानी?
लंबे समय तक तालिबान पर प्रभाव रखने वाला पाकिस्तान अब बदलते समीकरणों से असहज नजर आ रहा है। पाकिस्तान की रणनीति हमेशा अफगानिस्तान में अपनी पकड़ बनाए रखने की रही है, लेकिन रूस की सीधी एंट्री उसके प्रभाव को चुनौती दे सकती है।

कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि तालिबान रूस और चीन के ज्यादा करीब जाता है, तो पाकिस्तान की भूमिका सीमित हो सकती है। यही वजह है कि इस डील ने इस्लामाबाद के सत्ता और सुरक्षा गलियारों में चिंता बढ़ा दी है।

अमेरिका को भी लगा बड़ा झटका
अमेरिका के लिए भी यह समझौता रणनीतिक दृष्टि से बड़ा झटका माना जा रहा है। अफगानिस्तान से सेना हटाने के बाद अमेरिका क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए रखने की कोशिश कर रहा था। बगराम एयरबेस को लेकर अमेरिका की रुचि लगातार चर्चा में रही, लेकिन तालिबान ने हमेशा विदेशी सैन्य मौजूदगी का विरोध किया।

अब रूस के साथ तालिबान की नजदीकियों ने अमेरिका की संभावित वापसी या प्रभाव कायम करने की संभावनाओं को और कमजोर कर दिया है।

भारत के लिए क्या हैं कूटनीतिक मायने?
भारत इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद सतर्क नजर बनाए हुए है। अफगानिस्तान भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा और कनेक्टिविटी रणनीति का अहम हिस्सा रहा है। तालिबान की सत्ता वापसी के बाद भारत ने व्यावहारिक नीति अपनाते हुए सीमित कूटनीतिक संपर्क बनाए रखा है।

रूस भारत का पारंपरिक रणनीतिक साझेदार रहा है, इसलिए मॉस्को और तालिबान की बढ़ती नजदीकियां भारत के लिए अवसर और चुनौती दोनों पैदा कर सकती हैं। भारत यह समझने की कोशिश कर रहा है कि क्या यह नया समीकरण अफगानिस्तान में स्थिरता लाएगा या फिर कट्टरपंथ और आतंकवाद के नए जोखिम पैदा करेगा।

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क्या बन रही है नई क्षेत्रीय धुरी?
विशेषज्ञ इस पूरे घटनाक्रम को चीन-रूस-तालिबान के उभरते रणनीतिक समीकरण के रूप में भी देख रहे हैं। चीन पहले ही अफगानिस्तान में आर्थिक और सुरक्षा सहयोग बढ़ाने में रुचि दिखा चुका है। ऐसे में रूस की सक्रियता से एशिया में पश्चिमी प्रभाव को चुनौती देने वाली नई धुरी बनने की चर्चा तेज हो गई है।

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आने वाले समय में बढ़ सकती है भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा
रूस-तालिबान रक्षा समझौता केवल दो देशों के बीच सैन्य सहयोग नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति का बड़ा संकेत माना जा रहा है। इससे यह साफ हो गया है कि अफगानिस्तान एक बार फिर वैश्विक शक्तियों की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बनता जा रहा है।

आने वाले महीनों में इस समझौते का असर दक्षिण एशिया की सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी नीति, भारत-पाकिस्तान संबंधों और अमेरिका-रूस प्रतिस्पर्धा पर साफ दिखाई दे सकता है।

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