
घरेलू हिंसा केस में दिल्ली हाईकोर्ट का अहम फैसला, ससुर को लेकर साफ की कानूनी स्थिति
Delhi High Court: दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- वयस्क बेटे के आचरण पर पिता का नियंत्रण न होना अपने आप घरेलू हिंसा नहीं, आरोपी के खुद के कृत्य का होना जरूरी
New Delhi: दिल्ली हाईकोर्ट ने घरेलू हिंसा से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी ससुर को केवल इस आधार पर घरेलू हिंसा का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता कि वह अपने वयस्क बेटे के आचरण को नियंत्रित करने में विफल रहा। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ पारिवारिक रिश्ता होने से घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम की धारा 3 अपने आप लागू नहीं हो जाती।
जस्टिस मधु जैन ने एक महिला की याचिका खारिज करते हुए यह आदेश दिया। महिला ने निचली अदालत के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसके ससुर के खिलाफ घरेलू हिंसा से संबंधित कार्यवाही आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया गया था।
पति के दूसरी महिला से संबंध का आरोप
याचिकाकर्ता महिला का आरोप था कि उसका पति उससे अलग रह रहा है और उसका किसी अन्य महिला के साथ संबंध है। महिला ने दावा किया कि उसके ससुर को बेटे के इस कथित आचरण की जानकारी थी, लेकिन उन्होंने उसके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया।
महिला ने इसी आधार पर ससुर को भी घरेलू हिंसा से जुड़े मामले में जिम्मेदार ठहराने की मांग की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
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क्या कहती है घरेलू हिंसा कानून की धारा 3?
हाईकोर्ट ने कहा कि घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम की धारा 3 में ऐसे आचरण को घरेलू हिंसा माना गया है, जिससे किसी महिला को शारीरिक या मानसिक क्षति होती है या ऐसी क्षति होने की आशंका रहती है।
कानून के दायरे में शारीरिक हिंसा के अलावा मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक दुर्व्यवहार भी शामिल हैं। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पीड़िता और आरोपी के बीच केवल पारिवारिक संबंध होना घरेलू हिंसा की कार्यवाही शुरू करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
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वयस्क बेटे के व्यवहार के लिए पिता जिम्मेदार नहीं
कोर्ट ने कहा कि किसी वयस्क व्यक्ति के आचरण को नियंत्रित करने में उसके पिता की कथित विफलता को अपने आप घरेलू हिंसा नहीं माना जा सकता। ससुर के खिलाफ कार्रवाई के लिए यह दिखाना जरूरी है कि उन्होंने स्वयं ऐसा कोई आचरण किया है, जो कानून के तहत घरेलू हिंसा की श्रेणी में आता है।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने महिला की याचिका खारिज कर दी और निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। निचली अदालत ने ससुर के खिलाफ घरेलू हिंसा से संबंधित कार्यवाही आगे बढ़ाने से इनकार किया था।
कोर्ट के फैसले का सार यह है कि घरेलू हिंसा कानून के तहत जिम्मेदारी तय करने के लिए आरोपी के अपने कथित आचरण को देखना जरूरी है, केवल पारिवारिक रिश्ता अपने आप पर्याप्त आधार नहीं है।
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