
डॉक्टरों पर कार्रवाई से पहले विशेषज्ञ राय जरूरी, 21 साल बाद MP हाई कोर्ट ने उठाया सवाल
IMA: सुप्रीम कोर्ट की 2005 की गाइडलाइन के बावजूद MP में मेडिकल एक्सपर्ट बोर्ड नहीं बने, IMA की जनहित याचिका पर हाई कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से मांगा जवाब।
MP News: चिकित्सकीय लापरवाही यानी Medical Negligence के मामलों में डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई से पहले विशेषज्ञों की राय लेने के लिए मेडिकल एक्सपर्ट बोर्ड का गठन नहीं किए जाने पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA), सागर की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार से जवाब तलब किया है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने मामले में अनावेदकों को जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। याचिका आईएमए सागर के अध्यक्ष डॉ. तल्हा साद की ओर से दायर की गई है।
2005 में सुप्रीम कोर्ट ने तय की थी गाइडलाइन
याचिका में कहा गया है कि वर्ष 2005 में जैकब मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल नेग्लीजेंस के आरोपों में डॉक्टरों के खिलाफ सीधे आपराधिक कार्रवाई से पहले विशेषज्ञ चिकित्सकीय राय लेने की प्रक्रिया स्पष्ट की थी।
आईएमए का आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के बावजूद मध्य प्रदेश में जिला स्तर पर मेडिकल एक्सपर्ट बोर्ड का गठन नहीं किया गया है। याचिका में इसी व्यवस्था को लागू कराने की मांग की गई है।
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जिला स्तर पर मेडिकल बोर्ड बनाने की मांग
आईएमए सागर ने हाई कोर्ट से मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के अनुरूप प्रत्येक जिले में मेडिकल एक्सपर्ट बोर्ड का गठन किया जाए। इसके साथ ही मेडिकल लापरवाही से जुड़े मामलों में डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई से पहले विशेषज्ञों की राय लेने की निर्धारित प्रक्रिया लागू कराई जाए।
याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के करीब 21 साल बाद भी मध्य प्रदेश में जिला स्तर पर ऐसी व्यवस्था नहीं बन सकी है। इस स्थिति को लेकर आईएमए ने हाई कोर्ट का रुख किया है।
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हाई कोर्ट ने केंद्र और राज्य से मांगा जवाब
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से जवाब मांगा है। अदालत ने अनावेदकों को अपना जवाब पेश करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है।
अब सरकार की ओर से दाखिल किए जाने वाले जवाब पर मामले की आगे की सुनवाई होगी। इस मामले में हाई कोर्ट के रुख से मेडिकल नेग्लीजेंस के मामलों में विशेषज्ञ चिकित्सकीय राय और डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश सामने आने की उम्मीद है।
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