
सर्वपितृ अमावस्या पर क्यों जलाते हैं तेल का दीपक? जानें महत्व और नियम
Sarvapitri Amavasya 2026: आश्विन मास की अमावस्या तिथि को सर्वपितृ अमावस्या या पितृ विसर्जन अमावस्या के रूप में मनाया जाता है। यह पावन तिथि पितरों की आत्मिक शांति, तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए सर्वोपरि मानी गई है। इस दिन पंद्रह दिनों तक चले पितृ पक्ष का समापन होता है और इसके अगले दिन से शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ होता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सर्वपितृ अमावस्या की शाम को घर के मुख्य द्वार पर तेल का दीपक जलाना बेहद खास माना गया है। आइए जानते हैं इसके पीछे का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व।
मुख्य द्वार पर तेल का दीपक जलाने का कारण
पितरों की विदाई और प्रकाशमय मार्ग: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष के दौरान हमारे पूर्वज (पितृगण) अपने सूक्ष्म रूप में पृथ्वी लोक पर अपने वंशजों के यहां निवास करते हैं। सर्वपितृ अमावस्या के दिन वे वापस अपने लोक (पितृलोक) की ओर लौटते हैं। ऐसे में, जब वे प्रस्थान करते हैं, तो उनके मार्ग में कोई अंधकार या बाधा न आए और उनका मार्ग प्रकाशमय हो, इसलिए घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तेल का दीपक जलाया जाता है।
सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करना: शाम के समय दीपदान करके परिवार के सदस्य अपने पूर्वजों के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि हम अपने पितरों के बलिदान, स्नेह और आशीर्वाद को कभी भूलते नहीं हैं।
नकारात्मक ऊर्जा और बाधाओं का नाश: अमावस्या की रात्रि को घोर अंधकार माना जाता है। मुख्य द्वार पर दीपक जलाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है तथा नकारात्मक शक्तियां, बुरी नजर या प्रेतबाधाएं घर की चौखट से ही दूर रहती हैं।
मुख्य द्वार पर दीपक जलाने का महत्व
सर्वपितृ अमावस्या के दिन पितृगण अपने वंशजों के द्वार पर पिण्डदान और श्राद्ध की आशा लेकर पधारते हैं। अमावस्या की शाम को जब पितृगण अपने लोक (पितृलोक) की ओर वापस लौटते हैं, तो उनके मार्ग को प्रकाशमय बनाने के लिए मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तेल का दीपक प्रज्वलित किया जाता है।
दीपदान के समय बोली जाने वाली प्रार्थना
शाम के समय जब मुख्य द्वार पर दीपक प्रज्वलित किया जाता है, तो हाथ जोड़कर पितरों से क्षमा और आशीर्वाद मांगते हुए यह भावपूर्ण प्रार्थना की जाती है:“सेवा कछु कीन्हीं नहीं, दिया न कुछ भी ध्यान। गलती सब माफी करो, हमें जान अज्ञान॥ दीप ज्योति हमने करी, लीजों पंथ निहार। जो कुछ भी हमसे बनो, दीनों तुम्हें आहार॥ नमस्कार पुनि पुनि करुं, रखियों वंश को ध्यान। आशीष सदा देते रहो फूले फले तव बगियान॥”
सर्वपितृ अमावस्या से जुड़े जरूरी नियम
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दक्षिण दिशा का महत्व: पितरों का संबंध दक्षिण दिशा से माना गया है, इसलिए दीपदान करते समय दीपक की लौ या उसका मुख दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए।
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तिल के तेल या सरसों के तेल का प्रयोग: इस दिन संध्या के समय मुख्य द्वार पर सरसों के तेल या काले तिल के तेल का दीपक जलाना विशेष फलदायी माना जाता है।
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स्वच्छता का ध्यान: संध्या के समय दीप प्रज्वलित करने से पहले मुख्य द्वार की अच्छी तरह साफ-सफाई कर लें, क्योंकि माता लक्ष्मी और पितृगण दोनों ही स्वच्छ स्थानों पर वास करना पसंद करते हैं।





