एक मुट्ठी ‘कच्चे चावल’ से ऐसे भरा मां महाकाली का अगाध खप्पर

Shardiya Navratri 2026: शारदीय नवरात्र 2026 का पावन पर्व 11 अक्टूबर से प्रारंभ होने जा रहा है। नवरात्र के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना के साथ ही कलश स्थापना (घटस्थापना) की जाती है। इस वर्ष घटस्थापना का शुभ मुहूर्त प्रातः 6:19 बजे से 10:12 बजे तक रहेगा। 11 अक्टूबर से लेकर 19 अक्टूबर तक मां दुर्गा के नौ दिव्य स्वरूपों की पूरे नियम-निष्ठा से आराधना की जाएगी।

शास्त्रों में भगवती के स्वरूपों से जुड़ी कई अलौकिक कथाएं वर्णित हैं, जिनमें से एक कथा मां महाकाली के अगाध खप्पर और एक नन्हीं बालिका की अनन्य भक्ति से जुड़ी है।

मां काली का विकराल खप्पर

दैत्यराज रक्तबीज, शुंभ और निशुंभ के संहार के पश्चात भी माता का रौद्र स्वरूप शांत नहीं हो रहा था। युद्ध समाप्त हो चुका था, परंतु रणचंडी मां काली का भिक्षा-पात्र यानी खप्पर खाली ही था। उनके कदमों की आहट से संपूर्ण धरा कांप रही थी। देवी की भूख शांत करने के लिए इंद्र, कुबेर और समस्त दिक्पालों ने कामधेनु के दूध की नदियां, दिव्य अमृत और छप्पन प्रकार के व्यंजन उनके खप्पर में उंडेलना शुरू कर दिए। परंतु संपूर्ण ब्रह्मांड की संपदा समा जाने के बाद भी वह खप्पर रत्ती भर भी नहीं भरा।

नन्हीं बालिका ‘सरला’ का निश्छल प्रेम

घूमते-घूमते जब भगवती का प्रचंड स्वरूप पृथ्वी लोक के एक छोटे से गांव में पहुंचा, तो वहां के राजा और धनी सेठ सोने-चांदी के थालों में अन्न लेकर पहुंचे। जैसे ही उन्होंने भोजन खप्पर में डाला, वह तुरंत अदृश्य हो गया। भयभीत होकर सभी ग्रामीण अपनी जान बचाकर भाग खड़े हुए और पूरा गांव सूना हो गया। केवल एक जर्जर झोपड़ी में ‘सरला’ नाम की आठ वर्ष की दिव्यांग और अनाथ बालिका रह गई थी। दो दिनों से भूखी सरला को उसी सुबह भिक्षा में मात्र एक मुट्ठी कच्चे टूटे-फूटे चावल मिले थे, जिन्हें वह हांडी में पकाने ही वाली थी।

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जब कालरात्रि स्वरूप मां काली उसके द्वार पर पहुंचीं, तो बालिका डरी नहीं। उसने देवी के विकराल चेहरे में छिपी भूख और वेदना को महसूस किया। सरला ने घिसटते हुए अपने घुटनों के बल रेंगकर देवी के चरणों के समीप पहुंचकर अत्यंत स्नेहपूर्ण स्वर में अपने पास मौजूद वे कच्चे चावल मां के चरणों में अर्पित करने की प्रार्थना की।

बालिका ने अपनी नन्हीं हथेलियों में समेटे वे कच्चे चावल के दाने जैसे ही उस विशाल खप्पर में डाले, संपूर्ण सृष्टि एक अलौकिक चमत्कार की साक्षी बनी। जिस पात्र को देवताओं का सोमरस और राजाओं के भंडार नहीं भर सके थे, वह कच्चे चावल के दाने गिरते ही लबालब भर गया। उस खप्पर से दिव्य खीर की सुगंधित धाराएं छलकने लगीं।

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चावल का एक कण मुख में जाते ही जगदम्बा की भूख शांत हो गई और उनकी लाल आंखें वात्सल्य के आंसुओं से भीग गईं। माता का भयावह रूप पिघलकर साक्षात ‘मां अन्नपूर्णा’ के सौम्य स्वरूप में परिवर्तित हो गया। देवी ने बालिका को गोद में उठाकर आशीष दिया कि जहां भय और अहंकार से दिया गया दान व्यर्थ होता है, वहीं निश्छल प्रेम और सच्चे त्याग से दिया गया एक कण भी संपूर्ण ब्रह्मांड से भारी हो जाता है।

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