
Whatsapp को भरना पड़ेगा भारी जुर्माना… CCI ने प्राइवेसी पालिसी को लेकर उठाये सवाल
Restrictions On WhatsApp/Meta: फेसबुक और व्हाट्सएप की पेरेंट कंपनी मेटा को कॉम्पिटेटिव कमीशन ऑफ इंडिया से तगड़ा झटका लगा है. भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने सोशल मीडिया दिग्गज मेटा पर 213.14 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया है. यह जुर्माना 2021 में व्हॉट्सएप द्वारा लागू किए गए प्राइवेसी पॉलिसी अपडेट से जुड़ा हुआ है, जिसे आयोग ने अनुचित व्यावसायिक प्रथाओं के रूप में माना.
इसके अलावा, सीसीआई ने मेटा को आदेश दिया है कि वह भविष्य में प्रतिस्पर्धा-रोधी व्यवहार से बचें और अपनी प्राइवेसी पॉलिसी में सुधार करें.
सीसीआई की जांच में क्या मिला
सीसीआई ने मार्च 2021 में व्हाट्सएप की रिवाइज्ड प्राइवेसी पॉलिसी की जांच शुरू की, जिसने डेटा कलेक्शन के विस्तारित दायरे के साथ-साथ फेसबुक (अब मेटा) और उसकी कंपनियों के साथ अनिवार्य डेटा शेयरिंग को सक्षम बनाया. इससे पहले, 2016 से यूजर्स के पास यह तय करने का विकल्प था कि उन्हें अपना डेटा कंपनी के साथ शेयर करना है या नहीं. जनवरी 2021 से यूजर्स के लिए लागू होने वाली पॉलिसी फरवरी 2021 से प्रभावी होने वाली थी. व्हाट्सएप को चालू रखने के लिए यूजर्स को नई शर्तों को स्वीकार करने की आवश्यकता थी
मेटा पर लगे ये आरोप
साढ़े तीन साल से अधिक की जांच के बाद, सीसीआई ने पाया कि व्हाट्सएप की ‘टेक-इट-या-लीव-इट’ पॉलिसी अपडेट फेयर नहीं थी. इसने सभी यूजर्स को विस्तारित डेटा कलेक्शन शर्तों को स्वीकार करने और बिना किसी ऑप्ट-आउट के मेटा ग्रुप के भीतर डेटा शेयर करने के लिए मजबूर किया था. सीसीआई ने कहा कि मेटा की ओर से लाया गया ये अपडेट यूजर्स को लागू करने के लिए मजबूर करता है. उनकी स्वायत्तता को कम करता है, और मेटा की डॉमिनेंट पोजिशन का दुरुपयोग करता है.
सरकार ने लगाया व्हाट्सएप पर भारी जुर्माना
आयोग ने मेटा और व्हाट्सएप को तय समय सीमा के अंदर सीसीआई द्वारा लागू किये गए निर्देश पर अमल का भी आदेश दिया है. सीसीआई के निर्देशों के मुताबिक-
- व्हाट्सएप अगले 5 सालों तक अपने प्लेटफॉर्म पर एकत्र किए गए उपयोगकर्ता डेटा को विज्ञापन उद्देश्यों के लिए अन्य मेटा कंपनियों या मेटा कंपनी उत्पादों के साथ साझा नहीं करेगा.
- भविष्य में मेटा अगर इस डाटा को कहीं साझा करेगा भी तो उपभोक्ता को पता होना चाहिए कि उसका डाटा कहां साझा किया जा रहा है और उसकी अनुमति लेना जरूरी होगा.
- उपभोक्ता के सामने किसी तरह की कोई और शर्त नहीं रखी जाएगी.
- उपभोक्ता के सामने विकल्प होगा कि वह कंपनी की पॉलिसी को माने या ना माने, जबरन किसी पॉलिसी को मानने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा. भविष्य में भी अगर कोई अपडेट आएगा तो उसमें भी उपभोक्ता को किसी पॉलिसी को मानने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकेगा.
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