जानिए भारत की एकमात्र नदी नर्मदा के उल्टा बहने का पौराणिक रहस्य

Narmada River: सनातन धर्म में नदियों को देवी का दर्जा दिया गया है। भारत की अधिकांश पवित्र नदियां जैसे गंगा, यमुना और गोदावरी पूर्व दिशा की ओर बहती हैं और बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं। इसके ठीक विपरीत नर्मदा नदी भारत की एकमात्र ऐसी प्रमुख नदी है जो पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर बहती है और अरब सागर में विलीन होती है।

नर्मदा का यह “उल्टा बहना” केवल एक भौगोलिक घटना नहीं है, बल्कि इसके पीछे अमरकंटक की पहाड़ियों से जुड़ी एक अत्यंत भावुक, स्वाभिमानी और अनूठी पौराणिक कथा छिपी हुई है।

ऐसे हुआ था नर्मदा का जन्म

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अंधकासुर नाम के महादैत्य का वध करने के बाद भगवान शिव अत्यधिक थक गए थे और अमरकंटक की सुरम्य पहाड़ियों पर विश्राम कर रहे थे। उसी समय महादेव के ललाट से गिरे पसीने की बूंदों से एक अति सुंदर कन्या का प्राकट्य हुआ।

उस कन्या ने अपने बाल रूप से शिव के मन को ‘नर्म’ (सुख और आनंद) प्रदान किया, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनका नाम ‘नर्मदा’ रखा। महादेव ने नर्मदा को यह अमर वरदान भी दिया कि प्रलय काल में भी उनका अस्तित्व कभी समाप्त नहीं होगा।

सोनभद्र और दासी जुहिला का छल

राजकुमारी नर्मदा का विवाह सोनभद्र (सोन नद) के साथ तय हुआ था। दोनों के मध्य गहरा प्रेम था, परंतु विवाह से पूर्व नर्मदा के मन में अपने होने वाले पति को देखने की उत्कट इच्छा जागी। उन्होंने अपनी प्रिय सखी और दासी ‘जुहिला’ को अपना संदेश और उपहार देकर सोनभद्र के पास भेजा। नर्मदा ने जुहिला को अपने बहुमूल्य आभूषण भी पहना दिए थे।

जब सोनभद्र ने आभूषणों से सजी जुहिला को देखा, तो वे उसे ही राजकुमारी नर्मदा समझ बैठे और उसके सौंदर्य पर मोहित हो गए। दुर्भाग्यवश जुहिला के मन में भी कपट आ गया और उसने सोनभद्र को सत्य नहीं बताया।

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मोड़ लिया अपना रास्ता

जब दासी जुहिला बहुत देर तक लौटकर नहीं आई, तो नर्मदा स्वयं सोनभद्र से मिलने निकल पड़ीं। वहां पहुंचकर जब उन्होंने सोनभद्र और जुहिला को एक-दूसरे में मग्न देखा, तो उनका हृदय क्रोध और ग्लानि से भर गया। अपने प्रेमी और दासी के इस विश्वासघात से आहत होकर नर्मदा ने आजीवन कुमारी रहने का कठोर निर्णय लिया।

उन्होंने उसी क्षण सोनभद्र से अपना मुख मोड़ लिया और पूर्व दिशा (जहां सोनभद्र बहते हैं) के विपरीत पश्चिम की ओर बहना शुरू कर दिया। नर्मदा का यह विपरीत प्रवाह उनके उसी अखंड स्वाभिमान और क्रोध का प्रतीक माना जाता है।

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गंगा से भी अधिक पवित्र

पौराणिक ग्रंथों में नर्मदा नदी का माहात्म्य गंगा से भी उच्च बताया गया है। मान्यता है कि गंगा नदी में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह नर्मदा नदी के केवल दर्शन मात्र से सुलभ हो जाता है। एक प्रचलित कथा के अनुसार जब गंगा नदी संपूर्ण संसार के पापियों के पाप धोकर स्वयं मलिन हो जाती हैं, तब वे एक काली गाय का रूप धारण करके नर्मदा के जल में स्नान करने आती हैं और स्वयं को पुनः पवित्र करती हैं।

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