Navratri 2026: मां चंद्रघंटा की पूजा आज, जानें मां का प्रादुर्भाव और महिषासुर वध की कथा

Shardiya Navratri 2026: शारदीय नवरात्रि 2026 का आज तीसरा दिन है। मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 को विधि-विधान के साथ मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा (Maa Chandraghanta) की पूजा-अर्चना की जा रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा की आराधना करने से भक्तों में साहस, पराक्रम और आत्मविश्वास की वृद्धि होती है, तथा समस्त नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है। उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, जिसके कारण उन्हें यह नाम प्राप्त हुआ है।

शारदीय नवरात्रि के इस पावन अवसर पर आइए जानते हैं मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत दुर्गा सप्तशती से जुड़ी देवताओं के तेज से मां के प्रादुर्भाव और महिषासुर की सेना के वध की पौराणिक कथा:

देवताओं की पराजय और त्रिदेवों का रोष

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में देवताओं और असुरों के बीच पूरे सौ वर्षों तक घोर संग्राम हुआ था। उस युद्ध में असुरों का स्वामी महिषासुर था और देवताओं के नायक इन्द्र थे। इस युद्ध में देवताओं की सेना महाबली असुरों से परास्त हो गई और महिषासुर तीनों लोकों का स्वामी बन बैठा।

स्वर्ग से निकाले जाने पर सभी देवता प्रजापति ब्रह्माजी को आगे करके भगवान शंकर और विष्णु के पास पहुँचे। देवताओं ने विस्तार से अपनी पराजय और महिषासुर के अत्याचारों की कहानी सुनाई। यह सुनकर भगवान विष्णु और शिवजी अत्यंत क्रोधित हुए। उनके कोप से एक महान् तेज प्रकट हुआ, जिसमें ब्रह्मा, इन्द्र और अन्य सभी देवताओं का तेज भी मिल गया।

देवताओं के तेज से हुआ देवी का प्रादुर्भाव

समस्त देवताओं के शरीर से निकला वह तेज पुंज एक जाज्वल्यमान पर्वत की भांति फैल गया और अंततः एक अलौकिक नारी के रूप में परिणत हो गया। भगवान शंकर के तेज से देवी का मुख, यमराज के तेज से बाल, विष्णु भगवान के तेज से भुजाएँ, चंद्रमा के तेज से स्तन और इंद्र के तेज से कटिप्रदेश प्रकट हुआ। इसी प्रकार अन्य देवताओं के तेज से माता के विभिन्न अंग और आभूषण सुसज्जित हुए।

ये भी पढ़े-जानें ‘सात शीतला बहनें’ लोक परंपरा और बासौड़ा का महत्व

महिषासुर की सेना का संहार

देवी के प्रकट होने पर समस्त देवताओं ने उन्हें अपने अस्त्र-शस्त्र भेंट किए। भगवान शंकर ने शूल, विष्णु ने चक्र, वरुण ने शंख, अग्नि ने शक्ति और देवराज इंद्र ने वज्र व घंटा प्रदान किया। विश्वकर्मा ने अभेद्य कवच और अस्त्र दिए, जबकि हिमालय ने सवारी के लिए सिंह समर्पित किया।

देवी ने त्रैलोक्य को कंपा देने वाली प्रचंड गर्जना की, जिससे पूरी पृथ्वी और समुद्र कांप उठे। यह देखकर महिषासुर ने अपनी विशाल चतुरंगिणी सेना और महादैत्यों (जैसे चिक्षुर, चामर, उदग्र, असिलोमा आदि) को युद्ध के लिए भेज दिया। रणभूमि में भयंकर युद्ध छिड़ गया। देवी और उनके सिंह ने खेल-खेल में ही महिषासुर की असीम सेना और महादैत्यों का संहार कर डाला। इस प्रकार देवताओं को त्रास देने वाली असुर सेना का नाश हुआ।

ये भी पढ़े-Navratri 2026: आज करें करें मां ब्रह्मचारिणी की पूजा, जानें स्वरूप, प्रिय भोग और मंत्र

Back to top button